aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kas"
बाब-ए-हैरत जब तलक खुलता लियाक़त-'जाफ़री'क़ैस को फ़रहाद को आशुफ़्ता-सर समझा था मैं
हम हुए 'क़ैस' हुए 'वामिक़' ओ 'फ़रहाद' हुएज़ुल्फ़-ए-पुर-ख़म ने किया सब को परेशाँ कैसा
इक दिन ही ये मौक़ूफ़ हुआ ख़ाक का उड़नाक्या क्या न किया क़ैस ने सामान-ए-बयाबाँ
क़ैस को इश्क़ की तकरीम थी शायद कम-कमहम तुनक-ज़र्फ़ नहीं इश्क़ जो अफ़्साना बने
क्यों बयाबाँ बयाबाँ भटकता फिरा क्यों परेशाँ रहा ग़म-गज़ीदा रहाआज इक नौजवाँ मुझ से कहने लगा क़ैस पागल था दामन-दरीदा रहा
क़ैस की मीरास मेरे पास हैनाक़ा-ए-लैला को ढूँडो क्या हुआ
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