aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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इश्क़-बाज़ी में कहा 'जुरअत' को सब ने देख करये अज़ीज़ अपनी हमेशा जान पर खेला किया
गिला नहीं है जो उस ने मुझे न पहचानालहू-लुहान मिरी ज़िंदगी का चेहरा था
फिर है तिरे करम की ज़रूरत निगाह-ए-दोस्तआवाज़ दी है मुझ को ग़म-ए-रोज़गार ने
अज़ल से पूरी शिद्दत से ख़लाओं में मुअ'ल्लक़ हैंकभी तुम ने सुना है ये कि सय्यारों को नींद आई
ये नक़ाब-पोश ज़ालिम कोई ज़ोर है कि जिस नेकिए ख़ून सैकड़ों और न ज़रा नक़ाब उल्टा
ख़ुशी ने मिरा साथ छोड़ा है जब सेमिरे ग़म ही मुझ को सँभाले हुए हैं
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