aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "plato"
ज़मीर-ए-पाक ओ निगाह-ए-बुलंद ओ मस्ती-ए-शौक़न माल-ओ-दौलत-ए-क़ारूँ न फ़िक्र-ए-अफ़लातूँ
होश का दावा है बेहोशों को ज़ेर-ए-आसमाँख़ुम-नशीं मिस्ल-ए-फ़लातूँ सब हैं इस ख़ुम-ख़ाना में
दुख़्तर-ए-रज़ मिस्ल-ए-अफ़्लातूँ है जब तक ख़ुम में हैनश्शे में अपने से बाहर हों ये दानाई नहीं
दिल-ए-नादाँ की है क्या अस्ल अगर बुक़रात भी होतातो आता वो भी दम में उस बुत-ए-अय्यार-ओ-पुर-फ़न के
हम अपना नफ़्स-ए-अम्मारा समझने से रहे क़ासिरकिताब-ए-नफ़्स पढ़ कर आगे अफ़लातून से निकले
बुक़रात क्या मसीह भी देखें तो दें जवाबतेरे मरीज़-ए-इश्क़ का है ला-दवा मरज़
तू बुक़रात-ए-दौराँ है नासेह मगर हमसुनेंगे न तेरे मक़ालात हरगिज़
अब कि सुक़रात और फ़लातूँ सबमेरी गुफ़्तार से निकल आए
थी फ़लातूँ की जो जम्हूर से रु-गर्दानीहम समझते थे ख़ुराफ़ात ख़ुराफ़ात नहीं
सुना करता सदा बातें अगर बुक़रात-ओ-लुक़्माँ कीतो फिर उस बज़्म-ए-हस्ती के तरह-दारों से क्या कहता
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