aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "prison"
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहोकहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैंमौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
जिस को देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता हैशहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िंदाँ जानाँ
बात ये है कि सुकून-ए-दिल-ए-वहशी का मक़ामकुंज-ए-ज़िंदाँ भी नहीं वुसअ'त-ए-सहरा भी नहीं
छोड़ना घर का हमें याद है 'जालिब' नहीं भूलेथा वतन ज़ेहन में अपने कोई ज़िंदाँ तो नहीं था
असीरी दिल-ए-आशुफ़्ता रंग ला के रहीतमाम तुर्रा-ए-तर्रार तार तार किया
दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती हैतो 'फ़ैज़' दिल में सितारे उतरने लगते हैं
एक ज़िंदान-ए-बे-दिली और शामये सबा सी कहाँ से आती है
रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाए-नाकामीवो दश्त-ए-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं
आतिशीं-पा हूँ गुदाज़-ए-वहशत-ए-ज़िन्दाँ न पूछमू-ए-आतिश दीदा है हर हल्क़ा याँ ज़ंजीर का
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