aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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बरहना हैं सर-ए-बाज़ार तो क्याभला अंधों से पर्दा क्यों करें हम
एक क़त्ताला चाहिए हम कोहम ये एलान-ए-आम कर रहे हैं
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैंमैं ने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया
वो नवा-ए-मुज़्महिल क्या न हो जिस में दिल की धड़कनवो सदा-ए-अहल-ए-दिल क्या जो अवाम तक न पहुँचे
दिल के लुटने का सबब पूछो न सब के सामनेनाम आएगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही
सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सकेमैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिएये तमाशा अब सर-ए-बाज़ार होना चाहिए
मुझे ख़रीदने वालो क़तार में आओवो चीज़ हूँ जो पस-ए-इश्तिहार रहती है
वो हम नहीं थे तो फिर कौन था सर-ए-बाज़ारजो कह रहा था कि बिकना हमें गवारा नहीं
ये ख़ास-ओ-आम की बे-कार गुफ़्तुगू कब तकक़ुबूल कीजिए जो फ़ैसला अवाम करें
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