aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "roast"
क्या ज़रूरत है बहस करने कीक्यूँ कलेजा कबाब करते हो
आहें न कभी मुँह से निकलीं नाले न कभी आए लब तकहो ज़ब्त-ए-तप-ए-उल्फ़त का बुरा हम दिल ही दिल में भुनते हैं
दीदा-ए-यार कहें क्या उसे कैफ़-ए-मय मेंभून कर रोज़ गज़क करते हैं बादाम को हम
ऐ 'मुसहफ़ी' जल-भुन के हुआ ख़ाक में सारादिखलावेगी अब क्या तपिश-ए-दिल नहीं मालूम
शक्ल-ए-मह उस मेहर-वश बिन अपनी नज़रों में 'मुहिब'है ये कुछ पुर-दूद जूँ झुकता है भड़भूंजे का भाड़
ज़िंदा रह कर ही पहुँचेगा प्यार का नग़्मा गलियों गलियोंबात अधूरी रह जाती है जल-भुन कर परवाने की
ये सब लकड़ी के तख़्ते ख़ाक में मिल जाएँ जल-भुन करग़ज़ब हो जाए गर सच-मुच लहद में दाग़ रौशन हो
दौलत से तिरी सब कुछ हम पास मुहय्या हैलब ख़ुश्क ओ जिगर बिरयाँ चश्म-ए-तर ओ दिल सर दे
दिल-ए-सोज़ाँ से निकलते हैं शरर आज की रातहो न जल-भुन के कबाब अपना जिगर आज की रात
सरगर्म-ए-नाज़ देख के ग़ैरों के साथ उसेजल-भुन के हो गया दिल-ए-शैदा कबाब-ए-शब
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