aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना हैजो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है
जुर्म आदम ने किया और नस्ल-ए-आदम को सज़ाकाटता हूँ ज़िंदगी भर मैं ने जो बोया नहीं
जाने किस ने डर बोया है हम दोनों की राहों मेंमैं भी हूँ कुछ ख़ौफ़-ज़दा सा सहमा सहमा तू भी है
आसमाँ पर कोई कोंपल सा निकल आऊँगासाल-हा-साल से इस ख़ाक में बोया हुआ मैं
राही से बात करते हैं इंसान की तरहकितने ज़हीन हैं तिरे बोए हुए दरख़्त
ज़मीन और मुक़द्दर की एक है फ़ितरतकि जो भी बोया वही हू-ब-हू निकलता है
शादाब है जिस से किश्त-ए-हस्तीवो बीज भी मौत बो गई है
सच्चे शे'र का खलियान और भरता जाता हैदर्द की ज़मीनों में ग़म की फ़स्ल बोने से
मुसलसल गुलशन-ए-हस्ती में काँटे उस ने बोए हैंये दुनिया फिर इन्हीं काँटों से क्यूँ दामन बचाती है
दिलों के नाख़ुदा उठ कर सँभालें कश्तियाँ अपनीबहुत से ऐसे तूफ़ाँ 'मज़हरी' के दिल में पलते हैं
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