aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "sage"
जहाँ ग़रीब को नान-ए-जवीं नहीं मिलतीवहाँ हकीम के दर्स-ए-ख़ुदी को क्या कीजे
'असग़र' सनम-परस्त सही फिर किसी को क्याअहल-ए-हरम को काविश-ए-बेजा न चाहिए
करता है हमें मनअ' तू पैमाना-कशी सेपैमाना तिरी उम्र का मामूर हो ऐ शैख़
फ़लक उन से जो बढ़ कर बद-चलन होता तो क्या होताजवाँ से पेश-रौ पीर-ए-कुहन होता तो क्या होता
मैं नमाज़ी मैं ही पंडित रब ख़ुदा सब एक हैघोंट दो गर्दन भले तुम मज़हबी ज़ंजीर से
पूछा जो मैं हकीम से इल्लत-ए-कुन-फ़काँ है कौनसोच के उस ने ये कहा ग़ैर-ए-ख़ुदा कोई नहीं
दे रहा हूँ जिला शरारों कोख़ुद को मूबद बना रहा हूँ मैं
वो जो अपनी बे-तुकी बातों से ही मशहूर हैउस की बातें सुनने को सब शहर के 'आक़िल गए
नौजवानान-ए-चमन उस गुल से थर्राते हैं यूँजिस तरह काँपें किसी पीर-ए-कुहन के हाथ पाँव
छीन कर मुँह से ग़रीबों के निवाले 'शम्सी'हाकिम-ए-वक़्त ने क्या ख़ूब मसीहाई की
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