aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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निज़ाम-ए-दो-आलम की हो ख़ैर या-रबफिर इक आह करने को जी चाहता है
मंदिरों में संख बाजे मस्जिदों में हो अज़ाँशैख़ का धर्म और दीन-ए-बरहमन आज़ाद है
वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे मेंहक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में
आप ठहरे हैं तो ठहरा है निज़ाम-ए-आलमआप गुज़रे हैं तो इक मौज-ए-रवाँ गुज़री है
वो शोरिशें निज़ाम-ए-जहाँ जिन के दम से हैजब मुख़्तसर किया उन्हें इंसाँ बना दिया
इसी फ़िक्र में हैं ग़लताँ ये निज़ाम-ए-ज़र के बंदेजो तमाम-ए-ज़िंदगी है वो निज़ाम आ न जाए
जुनूँ के दम से है नज़्म-ए-दो-आलमजुनूँ बरहम-ज़न-ए-अफ़्कार भी है
गुलशन-ए-हुस्न-ए-यार में करते हैं जो तलाश-ए-कैफ़-ओ-सुकूँलाख है बरहम नज़्म-ए-दो-आलम ज़ुल्फ़ में निकहत आज भी है
शामिल था ये सितम भी किसी के निसाब मेंतितली मिली हनूत पुरानी किताब में
असर से दिल के बरहम क्यूँ निज़ाम-ए-दहर हो जाएहम इस से बे-वफ़ा क्यूँ हों वो हम से बा-वफ़ा क्यूँ हो
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