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ग़ज़ल
तुझे हादसात-ए-पैहम से भी क्या मिलेगा नादाँ
तिरा दिल अगर हो ज़िंदा तो नफ़स भी ताज़ियाना
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
तीन आवाज़ें
हर मसर्रत से मुझे आक़ किया है तू ने
वो ये कहते हैं तू ख़ुश-नूद हर इक ज़ुल्म से है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हिंदी ग़ज़ल
कितनी मुश्किल से बच पाया आँधी से ये नीड़ 'कुँवर'
अब तो बिजली की बारिश हैं बेचारा दम तोड़ न दे
कुंवर बेचैन
नज़्म
दुख मैले आकाश का
गालों पर बहने लगता है
फिर ठोड़ी के पंज-नद पर सब दुखों के धारे आ मिलते हैं
