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ग़ज़ल
उस को भी जला दुखते हुए मन इक शो'ला लाल भबूका बन
यूँ आँसू बन बह जाना क्या यूँ माटी में मिल जाना क्या
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
शायद
मता-ए-दिल मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ
बहुत कुछ बह गया है सैल-ए-माह-ओ-साल में अब तक
जौन एलिया
समस्त
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नज़्म
मुफ़्लिसी
मुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसी
गर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बला