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ग़ज़ल
कहा बुलबुल ने जब तोड़ा गुल-ए-सौसन को गुलचीं ने
इलाही ख़ैर कीजो नील-ए-रुख़्सार-ए-चमन बिगड़ा
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
बे-तरह बोझ से झुमकों के झुके पड़ते हैं
कीजो अल्लाह तू उन झुमकों की और कान की ख़ैर
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
इलाही ख़ैर कीजो कुछ अभी से दिल धड़कता है
सुना है मंज़िल अव्वल की पहली रात भारी है
भारतेंदु हरिश्चंद्र
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रेख़्ता शब्दकोश
chaaho
चाहो چاہو
तुम्हारा दिल चाहे, तुम्हारी मर्ज़ी, जो तुम्हें पसंद हो मुख़ाज़िब को दो बातों या कामों में इख़तियार देने या इन दोनों को एक हुक्म में दाख़िल करने के लिए मुस्तामल, या, ख़ाह, चाहे
khaa.o
खाओ کھاؤ
eat
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ग़ज़ल
ख़ुदा के वास्ते इंसाफ़ कीजो क्या तमाशा है
मैं उस का ख़ैर-ख़्वाह और वो मुझे बद-ख़्वाह जाने है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
जान-ए-जाँ तू कीजो जाँ-बख़्शी कि तुझ को देखने
एक बे-कस बे-ख़ुद ओ बे-इख़्तियार आने को है
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
तुझे कहता हूँ ऐ दिल इश्क़ का इज़हार मत कीजो
ख़मोशी के मकाँ में बात और गुफ़्तार मत कीजो