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ग़ज़ल
कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
साज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हम
नाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हम
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
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ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
तिश्नगी में लब भिगो लेना भी काफ़ी है 'फ़राज़'
जाम में सहबा है या ज़हराब मत देखा करो
अहमद फ़राज़
शेर
शकील बदायूनी
नज़्म
हम जो तारीक राहों में मारे गए
लब पे हर्फ़-ए-ग़ज़ल दिल में क़िंदील-ए-ग़म
अपना ग़म था गवाही तिरे हुस्न की
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ये कड़वाहट की बातें हैं मिठास इन की न पूछो तुम
नम-ए-लब को तरसती हैं सो प्यास इन की न पूछो तुम
जौन एलिया
ग़ज़ल
हर तरफ़ दीवार-ओ-दर और उन में आँखों के हुजूम
कह सके जो दिल की हालत वो लब-ए-गोया नहीं