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नज़्म
परछाइयाँ
ये मंज़रों की झलक खेत बाग़ दरिया गाँव
वो कुछ सुलगते हुए कुछ सुलगने वाले अलाव
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
तिरी रहमतों के दयार में तिरे बादलों को पता नहीं
अभी आग सर्द हुई नहीं अभी इक अलाव जला नहीं
ऐतबार साजिद
नज़्म
सुर्ख़ सितारा
काश तुम उस की हक़ीक़त पे नज़र डाल सको
है ये इक आतिश-ए-सद-बर्क़-बदामाँ का अलाव
आमिर उस्मानी
ग़ज़ल
बड़ी सर्द रात थी कल मगर बड़ी आँच थी बड़ा ताव था
सभी तापते रहे रात भर तिरा ज़िक्र क्या था अलाव था