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नज़्म
बाज़-आमद --- एक मुन्ताज
एक से एक चुहुल करती है
कोई कहती है मिरी चूड़ियाँ खनकीं तो खंखारी मिरी सास
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ये कहा सुन के ससुर ने कि कहीं है कोई
सास चुपके से ये बोलीं कि यहीं है कोई
नश्तर अमरोहवी
गीत
हम मेहनत वालों ने जब भी मिल कर क़दम बढ़ाया
सागर ने रस्ता छोड़ा पर्बत ने सीस झुकाया
साहिर लुधियानवी
नज़्म
महादेव-जी का ब्याह
पहले नाँव गणेश का, लीजिए सीस नवाए
जा से कारज सिद्ध हों, सदा महूरत लाए
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है
कहने की ज़रूरत नहीं आना ही बहुत है
इस दर पे तिरा सीस झुकाना ही बहुत है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बेवा की ख़ुद-कुशी
आ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूक
फट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूक
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
गुरु-नानक
इस बख़्शिश के इस अज़्मत के हैं बाबा नानक शाह गुरु
सब सीस नवा अरदास करो और हर दम बोलो वाह गुरु
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दीवारों का जंगल जिस का आबादी है नाम
बेबस को दोषी ठहराए उस जंगल का न्याय
सच की लाश पे कोई न रोए झूट को सीस नवाए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बीवियाँ
वो सास या ससुर हों कि देवर हो सब ख़राब
आया हुआ है मैके से कुत्ता भी ला-जवाब
नश्तर अमरोहवी
नज़्म
ख़ुशामद
सास बोले कहीं मत जा तिरे सदक़े जाऊँ
ख़ाला कहती है कि कुछ खा तिरे सदक़े जाऊँ

