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अप्रचलित ग़ज़लें
ہوا نے ابر سے کی موسم گل میں نمد بانی
کہ تھا آئینۂ خود بے نقاب زنگ بستن ہا
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ले उड़ा रंग फ़लक जल्वा-ए-रा'नाई का
अक्स है क़ौस-ए-क़ुज़ह में तिरी अंगड़ाई का