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ग़ज़ल
सारे सपेरे वीरानों में घूम रहे हैं बीन लिए
आबादी में रहने वाले साँप बड़े ज़हरीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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रेख़्ता शब्दकोश
saa.np aur sapere vaalii
साँप और सपेरे वालीسانپ اَور سَپیرے والی
قلبی عداوت ، ایسی دُشمنی جو دُور نہیں ہوسکتی ، ازلی بیر یا دشمنی.
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तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
कहानी
अनहोनी का चाक-ए-गरीबाँ, कौन रफ़ू कर पाए बोल सपेरे! तुमने अब के, कितने फनीअर पाले...
देवेन्द्र सत्यार्थी
ग़ज़ल
गले से दिल के रही यूँ है ज़ुल्फ़-ए-यार लिपट
कि जूँ सपेरे की गर्दन में जाए मार लिपट
नज़ीर अकबराबादी
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
ड्रामा
सआदत हसन मंटो
नज़्म
गाँधी-जी की आवाज़
कुचल दो बढ़ के हर इक साँप को सपेरे को
मिटाओ फ़िरक़ा-परस्ती के हर अँधेरे को