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ग़ज़ल
सिलसिला शोर-ए-सलासिल का यहाँ तक पहुँचा
दिल भी धड़के है तो ज़ंजीर की झंकार लगे
अज़ीज़ मुबारकपुरी
नज़्म
शिकवा
वादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहा
क़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
जाने किस रंग से आई है गुलिस्ताँ में बहार
कोई नग़्मा ही नहीं शोर-ए-सलासिल के सिवा