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ग़ज़ल
ये जो इक लड़की पे हैं तैनात पहरे-दार सौ
देखती हैं उस की आँखें भेड़िये ख़ूँ-ख़्वार सौ
प्रताप सोमवंशी
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अप्रचलित ग़ज़लें
دل لگا کر لگ گیا ان کو بھی تنہا بیٹھنا
بارے اپنی بیکسی کی ہم نے پائی داد یاں
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
मोहब्बत
ख़िराम-ए-नाज़ पाया आफ़्ताबों ने सितारों ने
चटक ग़ुंचों ने पाई दाग़ पाए लाला-ज़ारों ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुझे ख़ुद से अलग कैसे करूँ मैं
मेरा मक़्सद तुझे महफ़ूज़ रखना
तेरी ज़ीनत का पहरे-दार हूँ मैं