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ग़ज़ल
तेरी वफ़ा पर शक है मुझ को बात न कर बे-लाग हवा
उन की ख़ुशबू ले के न आई भाग यहाँ से भाग हवा
शौक़ असर रामपुरी
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ग़ज़ल
बाग़ में लाला कहे देख के नर्गिस तरफ़
चश्म का बीमार हो क्यूँकि खड़ा बे-असा
उबैदुल्लाह ख़ाँ मुब्तला
ग़ज़ल
दश्त-ए-जलाल फैला है और बे-‘असा हूँ मैं
हैरत-ज़दा हूँ ज़िंदा हूँ क्या मो'जिज़ा हूँ मैं
अमीर हम्ज़ा साक़िब
नज़्म
बस अना को बहाल रखना है
चाहे ग़म के पहाड़ जितने गिरें
बस अना को बहाल रखना है
सबीला इनाम सिद्दीक़ी
नज़्म
आख़िरी राय
न पूरी हुई थी न पूरी हुई है
जिसे हम ने आदम कहा था वो मिट्टी का बे-कार बे-अस्ल धोका था
जीलानी कामरान
ग़ज़ल
तूल खींच ऐ शब-ए-मय-ख़ाना कि सब कार-ए-सियाह
ब-हमा लज़्ज़त-ए-इक़दाम अभी बाक़ी हैं