aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "देहात"
देहाती पुस्तक भण्डार, दिल्ली
पर्काशक
मस्ती-भरी रातें आती हैंदेहात की कमसिन माह-वशें
ए चौदह बेस्वाएँ अच्छी ख़ासी मालदार थीं। उस पर शह्र में उनके जो ममलूका मकान थे, उनके दाम उन्हें अच्छे वसूल हो गए थे और उस इलाक़े में ज़मीन की क़ीमत बराए नाम थी और सब से बढ़ कर ये कि उनके मिलने वाले दिल-ओ-जान से उनकी माली इमदाद करने...
मैं अक्सर सोचता हूँ कि दर्दमंदी के इस जज़्बे ने मुझे कैसे कैसे भयानक दुख पहुंचाए हैं। ये क्या कम है कि मेरी जवानी के दिन बुढ़ापे की रातों में तबदील होगए हैं और जब ये सोचता हूँ तो इस बात का तहय्या करने पर मजबूर हो जाता हूँ कि...
कहने लगे, "मैं तुम्हारा क्या था और क्या हो गया हज़रत मौलाना की पहली आवाज़ क्या थी! मेरी तरफ़ सर-ए-मुबारक उठा कर फ़रमाया, चौपाल ज़ादे हमारे पास आओ, मैं लाठी टेकता उनके पास जा खड़ा हुआ। छत्ता पठार और दीगर देहात के लड़के नीम दायरा बनाए उनके सामने बैठे सबक़...
उसने देहात में परवरिश पाई थी। वहां की कई गर्मियां-सर्दियां देखी थीं मगर उसमें वो सख़्ती, वो गठाव, वो मर्दानापन नहीं था जो देहात की आम सिख लड़कियों में होता है जिन्हें कड़ी से कड़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है। उसके नक़्श पतले पतले थे, जैसे अभी नामुकम्मल हैं। छोटी छोटी...
नई लहर के अहम पाकिस्तानी शायर , रेल हादसे में देहांत हुआ।
मर्सिया शब्द अरबी मूल शब्द ‘रिसा’ से बना है जिसका अर्थ होता है किसी की मृत्यु पर विलाप करना| उर्दू शायरी की एक विधा के रूप में मर्सिया यूँ तो किसी भी प्रिय व्यक्ति के देहांत पर लिखी जाने वाली शोक-कविता हो सकता है|
देहातدیہات
गाँव, ग्राम, ग्रामाण क्षेत्र
देहांतدیہانت
देह का अंत, मृत्यु
चार-देहातچار دِیہات
वह जायदाद जिसमें चार गाँव की ज़मीन हो
देहात-ए-इस्तिमरारीدیہاتِ اِستِمراری
village held at a fixed rent
देहाती दुनिया
मेहता अमरनाथ मोहन
नज़्म
देहाती समाज
शरत्चन्द्र चट्रजी
नॉवेल / उपन्यास
सुग़रा ने जवाब दिया, “बीमार हैं।” सरदार संतोख सिंह ने अफ़सोस आमेज़ लहजे में कहा, “ओह... फिर उसने काग़ज़ का थैला खड़खड़ाया। जी, ये सिवय्यां हैं... सरदार जी का देहांत हो गया है... वो मर गए हैं!”...
इस दुनिया के नक़्शे मेंशहर तो हैं देहात नहीं
इकराम साहब हैरान थे कि बटोत जैसी ग़ैरआबाद और ग़ैर दिलचस्प देहात में पड़े रहने से मेरा क्या मक़सद है। वो ऐसा क्यों सोचते थे? इसकी वजह मेरे ख़याल में सिर्फ़ ये है कि उनके पास सोचने के लिए और कुछ नहीं था। चुनांचे वो इसी मसले पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करते...
चारपाई पर सूखने के लिए अनाज फैलाया जाएगा। जिसपर तमाम दिन चिड़ियाँ हमले करती, दाने चुगती और गालियां सुनती रहेंगी। कोई तक़रीब हुई तो बड़े पैमाने पर चारपाई पर आलू छीले जाएंगे। मुलाज़िमत में पेंशन के क़रीब होते हैं तो जो कुछ रुख़्सत-ए-जमा हुई रहती है उसको लेकर मुलाज़िमत से...
देहात में ऐसे पाए बहुत आम हैं जो आधे पट्टियों से नीचे और आधे ऊपर निकले होते हैं। ऐसी चारपाई का उल्टा-सीधा दरयाफ़्त करने की आसान तरकीब ये है कि जिस तरफ़ बान साफ़ हो वह हमेशा ‘उल्टा’ होगा। राक़िम-उल-हरूफ़ ने ऐसे अनघड़ पाए देखे हैँ जिनकी साख़्त में बढ़ई...
अब बड़े-बड़े शहरों में दाइयाँ और नर्सें सभी नज़र आती हैं लेकिन देहातों में अभी तक ज़चा-ख़ाना रविश-ए-क़दीम की तरह भंगिनों के ही दायरा-ए-इक़तिदार में है और एक अरसा-ए-दराज़ तक इस में इस्लाह की कोई उम्मीद नहीं। बाबू महेश नाथ अपने गाँव के ज़मींदार ज़रूर थे तालीम याफ़्ता भी थे।...
मिस्टर मुंशी हुकूमत बंबई के एक साबिक़ वज़ीर का अंदाज़ा है कि बंगाली में हर हफ़्ते क़रीबन एक लाख अफ़राद क़हत का शिकार हो रहे हैं। लेकिन ये सरकारी इत्तिला नहीं है। कौंसिल ख़ाने के बाहर आज फिर चंद लाशें पाई गईं। शोफ़र ने बताया कि ये एक पूरा ख़ानदान...
सेठ ने बहुत मारा-पीटा, टाँग पकड़ कर खींची, नथनों में लकुटी खोंस दी, मगर लाश न उठी तब कुछ अंदेशा हुआ ग़ौर से देखा बैल को खोल कर अलग किया और सोचने लगे कि गाड़ी क्यूँकर घर पहुँचे, बहुत चीख़े और चिल्लाए मगर देहात का रास्ता, बच्चों की आँख है...
ट्रेन मग़रिबी जर्मनी की सरहद में दाख़िल हो चुकी थी। हद-ए-नज़र तक लाला के तख़्ते लहलहा रहे थे। देहात की शफ़्फ़ाफ़ सड़कों पर से कारें ज़न्नाटे से गुज़रती जाती थीं। नदियों में बतखें तैर रही थीं। ट्रेन के एक डिब्बे में पाँच मुसाफ़िर चुप-चाप बैठे थे। एक बूढ़ा जो खिड़की...
ठाकुर साहब ने ये ख़ुश आइंद ख़बरें सुनीं और देहात की सैर को चले। वही तुज़्क-ओ-एहतिशाम, वही लठैतों का रिसाला, वही गुंडों की फ़ौज! गाँव वालों ने उनके ख़ातिर-ओ-ताज़ीम की तैयारीयां करनी शुरू कीं। मोटे ताज़े बकरों का एक पूरा गल्ला चौपाल के दरवाज़ा पर बाँधा। लकड़ी के अंबार लगा...
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