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नज़्म
रूह देखी है कभी!
चौदहवीं-रात के बर्फ़ाब से इक चाँद को जब
ढेर से साए पकड़ने के लिए भागते हैं
गुलज़ार
ग़ज़ल
ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए
मैं ढेर हो गया तूल-ए-सफ़र से डरते हुए
राजेन्द्र मनचंदा बानी
क़ितआ
इस के ब'अद कई साए से उस को रुख़्सत करते हैं
फिर दीवारें ढे जाती हैं दरवाज़ा गिर जाता है
जौन एलिया
ग़ज़ल
ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले
तिरी रफ़्तार का हम-रक़्स होना चाहता हूँ मैं
फ़रहत एहसास
नज़्म
जादूगर
हाथ के एक इशारे से पानी में आग लगा सकता हूँ
राख के ढेर से ताज़ा रंगों वाले फूल उगा सकता हूँ

