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ग़ज़ल
अमीर मीनाई
ग़ज़ल
मैं वो मजनूँ हूँ जो निकलूँ कुंज-ए-ज़िंदाँ छोड़ कर
सेब-ए-जन्नत तक न खाऊँ संग-ए-तिफ़्लाँ छोड़ कर
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
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ग़ज़ल
ज़वाल हुस्न खिलवाता है मेवे की क़सम मुझ से
लगाया दाग़ ख़त ने आन कर सेब-ए-ज़क़न बिगड़ा
हैदर अली आतिश
शेर
मज़े में अब तलक बैठा मैं अपने होंठ चाटूँ हूँ
लिया था ख़्वाब में बोसा जो यक शब सेब-ए-ग़बग़ब का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
सीने पे कहा मैं ने ये दो सेब हैं क्या हैं
शर्मा के ये चुपके से कहा और ही कुछ है
नज़ीर अकबराबादी
साक्षात्कार
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
लब उस के पिस्ता ज़क़न सेब आँखें हैं बादाम
खुले जो दाँत हँसी में नज़र अनार आया
