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ग़ज़ल
वो पर्दे से निकल कर सामने जब बे-हिजाब आया
जहान-ए-इश्क़ में यक-बारगी इक इंक़लाब आया
अनवर सहारनपुरी
ग़ज़ल
जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं
तकमील-ए-जुनूँ भी होती है और चाक गरेबाँ होते हैं
अनवर सहारनपुरी
शेर
जल्वा-ए-यार देख कर तूर पे ग़श हुए कलीम
अक़्ल-ओ-ख़िरद का काम क्या महफ़िल-ए-हुस्न-ओ-नाज़ में
अनवर सहारनपुरी
शेर
जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं
तकमील-ए-जुनूँ भी होती है और चाक गरेबाँ होते हैं
अनवर सहारनपुरी
ग़ज़ल
तेरा एहसास-ए-ख़ुदी होगा न जब तक बेदार
ग़ैर मुमकिन है खुलें तुझ पे अज़ल के असरार
आरज़ू सहारनपुरी
ग़ज़ल
अज़ल के दिन जिन्हें देखा था बज़्म-ए-हुस्न-ए-पिन्हाँ में
सिमट आएँ वही रानाइयाँ तस्वीर-ए-जानाँ में
आरज़ू सहारनपुरी
ग़ज़ल
मसीहा की नज़र मायूस बीमारों से उलझी है
क़यामत-कुन शिकस्ता-हाल दीवारों से उलझी है

