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ग़ज़ल
दावत-ए-‘इश्क़ की बेजा न करो ना-क़द्री
ये 'अमल 'इश्क़ को बेज़ार भी कर सकता है
मुहम्मद शकील अख़्तर
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ग़ज़ल
'अश्क' अपने सीना-ए-पुर-ख़ूँ में सैल-ए-अश्क भी
रोक रखता हूँ जिगर के ख़ून की तहलील तक
अश्क अमृतसरी
ग़ज़ल
अहसन अहमद अश्क
ग़ज़ल
जहाँ पहुँची हैं पर्दे चाक कर के 'इश्क़ की नज़रें
कहाँ तू ने वो मंज़र ऐ निगाह-ए-आम देखा है
अशक संभली
ग़ज़ल
'अश्क' उसूल-ए-कस्ब-ए-ज़र से तू नहीं है आश्ना
तिश्ना-ए-तकमील है तेरी हमा-दानी हनूज़
अश्क अमृतसरी
शेर
ऐ मुक़ल्लिद बुल-हवस हम से न कर दावा-ए-इश्क़
दाग़ लाला की तरह रखते हैं मादर-ज़ाद हम