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ग़ज़ल
'फ़ज़ा' है ख़ालिक़-ए-सुब्ह-ए-हयात फिर भी ग़रीब
कहाँ कहाँ न उफ़ुक़ की तलाश में डूबा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
जल गया धूप में यादों का ख़ुनुक साया भी
बे-नवा दश्त-ए-बला में कोई हम सा भी नहीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
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ग़ज़ल
जिसे मिल जाए ख़ाक-ए-पाक-ए-दश्त-ए-कर्बला 'परवीं'
पलट कर भी न देखे वो कभी इक्सीर की सूरत
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
सर-गर्म-ए-सफ़र हूँ मैं तिरे दश्त में कब से
मुझ को मिरी मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देता
इब्न-ए-रज़ा
ग़ज़ल
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ
हम से अजब तिरा दर्द का नाता देख हमें मत भूल मियाँ
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ऐ मतवालो! नाक़ों वालो!!
तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए
ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा