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ग़ज़ल
ख़्वाब के ख़दशे से अब नींद उड़ी जाती है
मैं ने देखा है उसे छोड़ के जाता हुआ घर
आदिल रज़ा मंसूरी
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नज़्म
उदास शाम की एक नज़्म
मगर ये ख़दशे, ये वसवसे तो तकल्लुफ़न हैं
जो बे-इरादा सफ़र पे निकलें
नोशी गिलानी
ग़ज़ल
मुझे अक्सर ये लगता है कि जैसे हूँ नहीं हूँ मैं
मुझे होने न होने के ये ख़दशे मार देते हैं
नुज़हत अब्बासी
ग़ज़ल
कहाँ का सब्र सौ सौ बार दीवानों के दिल टूटे
शिकस्त-ए-दिल के ख़दशे ही से नादानों के दिल टूटे
ज़िया जालंधरी
नज़्म
कुछ अगर है तो मिले
जागे ख़दशे भी ख़द्द-ओ-ख़ाल तमन्ना से हूँ मबहूत
हर इक उज़्लत-ए-जाँ शौक़ की शमशीर लिए
किश्वर नाहीद
ग़ज़ल
ये ख़लफ़िशार-ए-ज़ेहन ये ख़दशे ये हुज्जतें
इन सब का बस है एक ही हल रास्ता बदल

