aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "Ref-Rekhta"
माज़ी के रेग-ज़ार पे रखना सँभल के पाँवबच्चों का इस में कोई घरौंदा बना न हो
हों रेग के मानिंद शब-ओ-रोज़ सफ़र मेंआवारा-ए-वहशत कोई मंज़िल नहीं रखता
लिखी है किस ने ये तहरीर रेग-ए-साहिल परबहुत दिनों से समुंदर उदास रहता है
साहब दिलों से राह में आँखें मिला के देखरखता है तू भी दिल तो उसे आज़मा के देख
सोचों की पालकी में बिठा कर सुतूर कोकाग़ज़ पे खींच लाया हूँ जन्नत की हूर को
तिश्नगी अच्छी नहीं रखना बहुतरौज़न-ए-गुल से उसे तकना बहुत
रेग-ए-सहरा उन्हें निगलती हैजिन की रह में सराब रहता है
आइना भी आईना-गर से उलझता रह गयामैं ही उस बहरूप घर में एक झूटा रह गया
किसी की आँख में आँसू उतार देता हैकिसी के दिल को वो सब्र-ओ-क़रार देता है
सूरज छुपा इक इक गुल-ए-मंज़र बिखर गयाशो'ला सा कोई दिल में उतर कर बिखर गया
इंतिहाओं में तुझ से अलग हो गए इब्तिदाओं से ही सहल-अंदाज़ थे'उम्र के रेग-ज़ारों से गुज़रे नहीं और शानों पे इल्ज़ाम रखा गया
आ गया हो न कोई भेस बदल कर देखोदो क़दम साए के हमराह भी चल कर देखो
सूरज सरों पे आग उगलता दिखाई देमुझ को ये शहर आज पिघलता दिखाई दे
कब तलक बैठा रहेगा ये जहाँ दर पर मिरेऔर कितने दिन रहेगा आसमाँ सर पर मिरे
साहिल पे ज्यूँ ही पाँव रखा रेग-ज़ार नेपानी में जितने दफ़्न थे दरिया उछल पड़े
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