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ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-इश्क़ में गया दिल हाथ से मिरे
अंजाम क्या हो देखिए अब मेरे काम का
ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-इश्क़ ही में शिकवा बुतों का ऐ दिल
दुख सब्र अभी तो क्या क्या सितम न होंगे
आग़ा मोहम्मद तक़ी ख़ान तरक़्क़ी
कुल्लियात
ख़ून-ए-जिगर ही खाना आग़ाज़-ए-इश्क़ में है
रहती है इस मरज़ में फिर कब ग़िज़ा की ख़्वाहिश
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
आग़ाज़-ए-इश्क़ है वो बढ़ाते हैं रस्म-ओ-राह
हम दिल में ख़ौफ़ करते हैं अंजाम-ए-कार से