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कुल्लियात
आया सो आब-ए-तेग़ ही मुझ को चटा गया
था वो बुरिंदा ज़ख़्मों पे मैं ज़ख़्म खा गया
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
धोऊँ सद-आब-ए-तेग़ से ऐ पम्बा जो कभू
दामन से तेरे दामन दाग़-ए-जिगर मिले
मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
नज़्म
नक़्श-ए-मोहब्बत
तड़प तड़प के तो बिस्मिल ने जान तक दे दी
वो आब-ए-तेग़ के दो घूँट भी पिला न सके
नूर लुधियानवी
ग़ज़ल
तिश्ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ी-कश
दम-दार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है
मीर तक़ी मीर
शायरी के अनुवाद
मिटाना ज़ुल्म से है ग़ैर-मुमकिन ज़ुल्म को 'बे-दिल'
बुझाई है किसी ने आग आब-ए-तेग़-ओ-ख़ंजर से