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क़ितआ
मुझे इक्सीर मेरी आह-ए-सोज़ाँ कर के छोड़ेगी
क़नाअ'त मेरी दर्द-ए-दिल को दरमाँ कर के छोड़ेगी
जगत मोहन लाल रवाँ
ग़ज़ल
मिरी शाम गुल-बदामाँ मिरी शब शब-ए-चराग़ाँ
तिरे दम क़दम से क्या क्या है फ़रोग़-ए-आह-ए-सोज़ाँ
नाज़िश सह्सहरामी
ग़ज़ल
लगा दी आतिश-ए-ख़ामोश क्या सोज़-ए-मोहब्बत ने
इलाही ख़ैर दूद-ए-आह-ए-सोज़ाँ दिल से उठता है
शेर सिंह नाज़ देहलवी
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siina-e-sozaa.n
सीना-ए-सोज़ाँ سِینَۂ سوزاں
ग़म से जलता हुआ सेना, दर्द भरा दिल
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ग़ज़ल
नशेमन फूँक कर ख़ुश हैं चराग़ाँ देखने वाले
लपट में आह-ए-सोज़ाँ की गुलिस्ताँ देखने वाले
अनवर सादिक़ी
नज़्म
ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
ये ज़ख़्म गुलज़ार बन गए हैं
ये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
निकल ही जाए न दम अपना आह-ए-सोज़ाँ से
ज़बाँ पे लफ़्ज़ तो रख इस तरह न तेवर खींच
फ़रहत नादिर रिज़्वी
ग़ज़ल
यहाँ दम खींचना दो दोपहर मुश्किल है हो जाता
धुआँ घटता है जब सीने में अपनी आह-ए-सोज़ाँ का
ममनून निज़ामुद्दीन
ग़ज़ल
नुसरत लखनवी
ग़ज़ल
नहीं बाब-ए-इजाबत गर खुला तो हो गिला क्यूँकर
रसा होना सिखाया ही नहीं जब आह-ए-सोज़ाँ को
डॉ. हबीबुर्रहमान
ग़ज़ल
धुआँ सू-ए-फ़लक उठता है मेरी आह-ए-सोज़ाँ का
इलाही ख़ैर हो दिल की न जाने बोलता क्या है