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नज़्म
कही अन-कही
ज़िंदगी ख़्वाब है तस्वीर तिरी सूती है
ख़्वाब था या आलम-ए-बेदारी था
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
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नज़्म
उर्दू
फ़ज़ा-ए-इल्म-ओ-फ़न पर ये मिसाल-ए-अब्र छाई है
मज़ाक़-ए-जुस्तुजू बन कर रग-ए-दिल में समाई है
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
ग़ज़ल
'अलम’ रब्त-ए-दिल-ओ-पैकाँ अब इस आलम को पहुँचा है
कि हम पैकाँ को दिल दिल को कभी पैकाँ समझते हैं