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ग़ज़ल
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
ब-पास-ए-वज़ा-दारी अब भी उन गलियों में जाता हूँ
जहाँ के रहने वालों ने मुझे रुस्वाइयाँ बख़्शीं
तालिब महमूद
ग़ज़ल
वही जोश-ए-हक़-शनासी वही अज़्म-ए-बुर्द-बारी
न बदल सका ज़माना मिरी ख़ू-ए-वज़ा-दारी
जुर्म मुहम्मदाबादी
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ग़ज़ल
लिहाज़-ए-वज़्अ'-दारी में कभी मुमकिन न हो शायद
तुम्हारा दो क़दम आना हमारा दो क़दम जाना
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
ग़ज़ल
पास-ए-रब्त-ए-ग़ैर हम से छोड़ कर रस्म-ए-क़दीम
इंक़लाब-ए-वज़्अ'-दारी मेहरबाँ होने के बाद
नाज़िश बदायूनी
ग़ज़ल
मेरी ख़ामोशी फ़क़त मेरी वज़्अ'-दारी नहीं
साँस आ पाए तो बोलूँ जब्र में और क़हर में
मोहम्मद जावेद अनवर
ग़ज़ल
वज़्अ-दारी इसे कहिए कि हरम में भी 'रविश'
ख़ुद ही बढ़ कर किसी ग़ारत-गर-ए-आलम से मिला
रविश सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
ख़ूब'' वज़्अ'-दारी है ज़ख़्म-ए-ताज़ा से पहले
हम से हाल-ए-दिल पूछा दिल दुखाने वालों ने
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
वज़्अ'-दारी और रवा-दारी के वो जल्वे कहाँ
ज़ेहन-ओ-दिल की कज-रवी हुस्न-ए-शराफ़त खा गई
तरब सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
तर्क-ए-मय-ख़ाना है 'शाइर' वज़्अ'-दारी के ख़िलाफ़
जाम ख़ाली है तो पीने की अदाकारी करो