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शेर
ग़म सीं अहल-ए-बैत के जी तो तिरा कुढ़ता नहीं
यूँ अबस पढ़ता फिरा जो मर्सिया तो क्या हुआ
आबरू शाह मुबारक
ग़ज़ल
पी लिया जाम-ए-शहादत सारे अहल-ए-बैत ने
पर यज़ीदी लश्करों को रहम तक आया नहीं
सय्यद महमूद अालम रहबर
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'aql-e-basiit
'अक़्ल-ए-बसीतعَقْلِ بَسِیط
(दर्शनशास्त्र) बुद्धि का वह स्तर जिसमें वह उन समस्त ज्ञान, न्यायशास्त्र और विज्ञान से जिनका विलय अंतर्मन में व्यावहारिक रूप से हो चुका होता है, संगठित होती है, इस स्तर पर बुद्धि प्रचुरता और विवरण से मुक्त होती है
hal-o-bast
हल-ओ-बस्तحَل و بَسْت
رک : حل و عقد
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मनक़बत
है अहल-ए-बैत से दा'वा मोहब्बतों का मगर
'अमल से दूर हुए हैफ़ हम ग़ुलाम-ए-हुसैन
फ़रहत हुसैन ख़ुशदिल
नअत
वो भटक सकते नहीं हरगिज़ कि जिन के राहबर
उन के अहल-ए-बैत भी हैं और उन के यार भी
तनवीर जमाल उस्मानी
सलाम
मिरी गर कोई 'इज़्ज़त है तो बस इस का सबब ये है
मैं अहल-ए-बैत की 'वासिफ़' बहुत तौक़ीर करता हूँ
जब्बार वासिफ़
ग़ज़ल
और बा-मा'नी हुआ तश्कीक का पिछ्ला निसाब
क्या कहूँ अहल-ए-यकीं ने क्या गुमाँ पर लिख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
हम वही अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-वफ़ा साहिब-दिल
हम कि हर दौर में औराक़-ए-ज़माना के अमीं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
हम उन्हीं अहल-ए-वफ़ा के चाहने वालों में हैं
आसमाँ जिन के लिए सदियों लहू बरसाए है
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं

