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ग़ज़ल
इन दिनों ऐ 'सैफ़' अपना तो यही है मश्ग़ला
जोड़ता जाता हूँ मैं और टूटता जाता है दिल
सैफ़ समस्तीपुरी
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ग़ज़ल
'ज़ुल्फ़ी' वो सरज़मीं कि जहाँ दफ़्न है 'शकेब'
वो क्यूँ न अहल-ए-फ़न के लिए मोहतरम बने
सैफ़ ज़ुल्फ़ी
ग़ज़ल
कोई ऐसा अहल-ए-दिल हो कि फ़साना-ए-मोहब्बत
मैं उसे सुना के रोऊँ वो मुझे सुना के रोए