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नज़्म
अहल-ए-जुनूँ
हम वही अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-वफ़ा साहिब-दिल
हम कि हर दौर में औराक़-ए-ज़माना के अमीं
नूर-ए-शमा नूर
ग़ज़ल
और बा-मा'नी हुआ तश्कीक का पिछ्ला निसाब
क्या कहूँ अहल-ए-यकीं ने क्या गुमाँ पर लिख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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Galat-ul-haal
ग़लत-उल-हाल غَلَطُ الْحال
इस ज़माने की ग़लती, वह ग़लती जिस ने इस ज़माने में रवाज पाया हो
Galat-ul-'aam
ग़लत-उल-'आम غَلَطُ الْعام
वह ग़लती जो विद्वज्जन करें और वह शुद्ध मान ली जाए, वह ग़लत शब्द या वाक्यांश आदि जो ग़लत होने के बावजूद विद्वानों और आधिकारिक भाषाविदों के बीच चलन में हो
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नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
मिज़ाज-ए-अहल-ए-दिल की इम्तियाज़ी शान तो देखो
जो दुश्मन जान-ओ-दिल का है उसी से प्यार हो जाए
कँवल एम ए
ग़ज़ल
ज़ब्त-ए-ग़म से लाख अपनी जान पर बन आए है
हाँ मगर ये इज़्ज़त-ए-सादात तो रह जाए है
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
कहे जाता है जो वाइज़ सुने जाते हैं हम लेकिन
जो अहल-ए-दिल नहीं उस को हमारे दिल से क्या निस्बत
