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ग़ज़ल
विसाल-ओ-हिज्र के क़िस्से किसे सुनाऊँ 'अमल'
है कोई जो मिरे ज़ख़्मों का चारा-कार करे
आमिना अमल इदरीसी
ग़ज़ल
इश्क़-ए-कामिल में तो हाजत अमल-ए-हुब की नहीं
क़ैस माशूक़ बना हो गई लीला आशिक़
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
ग़ज़ल
क़ाइल ब-दिल हूँ तब अमल-ए-हुब का मैं कि जब
उस शोख़ से ब-जद्द-ओ-कद-ए-आमिलाँ मिलूँ
जुरअत क़लंदर बख़्श
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jaan-o-maal ko du'aa detaa huu.n
जान-ओ-माल को दु'आ देता हूँجان و مال کو دُعا دیتا ہُوں
बुज़ुर्ग को मिज़ाजपुर्सी पर जवाब देते हैं
hubb-ul-vatan minal-iimaan
हुब्ब-उल-वतन मिनल-ईमानحُبُّ الْوَطَن مِنَ الاِیْمَان
وطن کی محبت ایمان کا حصّہ ہے .
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ग़ज़ल
बे-अमल लोगों से जब पूछो तो कहते हैं की 'शान'
हम अज़ल से क़िस्मत-ए-नाकाम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार
चराग़ राह में उस के अमल से जलने लगे
लो आज सुब्ह-ए-शब-ए-इंतिज़ार आ ही गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
वो दिल को देखता है न आमाल-ए-ज़ाहिरी
लैला के ख़्वास्त-गार को महमिल से क्या ग़रज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
पारसा हम-राह ले जाएँगे पिंदार-ए-अमल
हम तो अपने साथ उन की ख़ाक-ए-पा ले जाएँगे