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ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
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ग़ज़ल
अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है
मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शोला-सामानी नहीं जाती
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ गुल होती जाती है
मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
हमें नाबूद मत करना
मगर मेरे अक़ीदे का तअय्युन करने वालों ने
मिरे मस्लक के बारे में