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ग़ज़ल
'अबस है पेश-ए-अर्बाब-ए-सुख़न अज़्म-ए-सुख़न मुझ को
वफ़ा कहने न देगी क़िस्सा-ए-रंज-ओ-मेहन मुझ को
अब्बास अली ख़ान बेखुद
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ग़ज़ल
बार हूँ दीदा-ए-अर्बाब-ए-सुख़न पर 'मुज़्तर'
मुद्दई मेरे कमालों से दबे जाते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
बशीर बद्र
ग़ज़ल
बाइ'स-ए-हैरत-ए-अर्बाब-ए-सुख़न है 'महरूम'
अहद-ए-पीरी में तुम्हारा ये ग़ज़ल-ख़्वाँ होना