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ग़ज़ल
अर्ज़-ए-मतलब ने किया और भी कुछ ख़्वार मुझे
जब भी मिलते हैं सुना देते हैं दो-चार मुझे
आग़ा नगीनवी
ग़ज़ल
हमारी अर्ज़-ए-मतलब पर तिरा बेज़ार हो जाना
ज़रा सी बात पर आमादा-ए-पैकार हो जाना
हामिद हुसैन हामिद
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duniyaa aur matlab
दुनिया और मतलब دُنیا اَور مَطْلَب
दुनिया वाले स्वार्थी होते हैं अपने मतलब ही से काम रखते हैं
duniyaa hai aur matlab
दुनिया है और मतलब دنیا ہے اور مطلب
अपना मतलब प्रधान है
duniyaa aur matlab aur matlab so apnaa
दुनिया और मतलब और मतलब सो अपना دُنیا اَور مَطْلَب اَور مَطْلَب سو اَپْنا
दुनिया वाले ख़ुदग़रज़ होते हैं और अपना मतलब सब से मुक़द्दम होता है
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नज़्म
मुस्लिम-लीग
अर्ज़-ए-मतलब में ज़बाँ कुछ तो है खुलती जाती
गरचे अब तक भी हरीफ़ों से हम-आहंग नहीं
शिबली नोमानी
ग़ज़ल
अदा-ए-गअरज़-ए-मतलब में ग़ज़ब की कामयाबी है
अजब हुस्न-ए-तलब रखता है अंदाज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरा
शहीर मछलीशहरी
ग़ज़ल
झुक गया सर अर्ज़-ए-मतलब पर बरा-ए-इख़्तिसार
हम ने चाहा था कि अफ़्साना-दर-अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
ग़ज़ल
अकेला पा के उन को अर्ज़-ए-मतलब कर ही लेता हूँ
न चाहूँ तो भी इज़्हार-ए-तमन्ना हो ही जाता है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
अगर वो गालियाँ देने पर आमादा हैं ख़ल्वत में
तो हम भी अर्ज़-ए-मतलब के लिए तय्यार बैठे हैं
अनवरी जहाँ बेगम हिजाब
नज़्म
सय्यद की लौह-ए-तुर्बत
अर्ज़-ए-मतलब से झिजक जाना नहीं ज़ेबा तुझे
नेक है निय्यत अगर तेरी तो क्या पर्वा तुझे