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ग़ज़ल
झुक गया सर अर्ज़-ए-मतलब पर बरा-ए-इख़्तिसार
हम ने चाहा था कि अफ़्साना-दर-अफ़्साना कहें
कँवल एम ए
नज़्म
गुलहा-ए-अक़ीदत
अब यही कोशिश है दिल से ऐ मिरी अर्ज़-ए-वतन
तेरी पेशानी पे अब कोई शिकन आने न पाए
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
तख़रीब-कारों की शहादत
क़ातिल ओ ज़ालिम दर-ए-जन्नत पे मंडलाने लगे
अर्ज़-ए-पाकिस्तान से कितने शहीद आने लगे
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
तू ने हम से कलाम भी छोड़ा अर्ज़-ए-वफ़ा के सुनते ही
पहले कौन क़रीब था हम से अब तो और बईद हुआ
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
पाक ओ हिन्द यक-जेहती
मियान-ए-हिन्द-ओ-पाकिस्तान इक सरहद का झगड़ा है
वगर्ना इस इमारत के मनारे एक जैसे हैं
खालिद इरफ़ान
हास्य
ऐ कराची मुल्क-ए-पाकिस्तान के शहर-ए-हसीं
मरने वालों को जहाँ मिलती नहीं दो गज़ ज़मीं