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ग़ज़ल
ख़ुद क़ल्ब मिरा जल्वा-गह-ए-हुस्न-ए-अज़ल है
ऐ 'ज़ब्त' मैं जोया-ए-सनम-ख़ाना नहीं हूँ
ज़ब्त सीतापुरी
ग़ज़ल
हटा ले दिल को अगर 'ज़ब्त' अह्ल-ए-दुनिया से
बराबर उस की निगाहों में ख़ैर-ओ-शर हो जाए
ज़ब्त सीतापुरी
ग़ज़ल
तलाश-ए-यार और इस बे-ख़ुदी में 'ज़ब्त' कब मुमकिन
वो आलम है बता सकते नहीं ख़ुद ही निशाँ अपना
ज़ब्त सीतापुरी
ग़ज़ल
'ज़ब्त' अब कुछ है उमीद-ए-इर्तिक़ा-ए-ज़िंदगी
दिल में आता है नज़र फिर रंग-ए-मय-ख़ाना मुझे
ज़ब्त सीतापुरी
ग़ज़ल
जो आहन मोम कर दे और पत्थर को भी पिघला दे
जनाब-ए-'ज़ब्त' की बातों में वो तासीर देखी है