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ग़ज़ल
रह के गुलशन में भी तरसे हैं गुल-ए-तर के लिए
ये मुक़द्दर था तो क्या रोएँ मुक़द्दर के लिए
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
तबीअ'त बे-नियाज़-ए-लज़्ज़त-ए-ग़म होती जाती है
किसी से क्या मिरी दिल-बस्तगी कम होती जाती है
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
राजेश कुमार औज
ग़ज़ल
आब-ए-कौसर तो न था चश्म-ए-सियह में तेरी
पड़ गई जान तुझे देख के दीवाने में
राज्य बहादुर सकसेना औज
ग़ज़ल
क़द्र-ए-वफ़ा भी होगी किसी दिन जफ़ा के बा'द
लाएगा रंग-ए-ख़ून-ए-शहीदाँ हिना के बा'द
