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ग़ज़ल
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
ख़ाक करती है ब-रंग-ए-चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम रक़्स
हर दो-आलम को तिरा रखता है बे-आराम रक़्स
बयान मेरठी
ग़ज़ल
ब-रंग-ए-निकहत-ए-गुल है चमन में आशियाँ अपना
किसी के राज़दाँ हम हैं न कोई राज़-दाँ अपना
क़ैसर अमरावतवी
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ग़ज़ल
रऊफ़ सादिक़
कुल्लियात
ब-रंग-ए-बू-ए-गुल उस बाग़ के हम आश्ना होते
कि हमराह-ए-सबा टुक सैर करते फिर हवा होते
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ब-रंग-ए-'जौन' ही निखरी घुटन आहिस्ता आहिस्ता
नज़र आने लगा बाम-ए-सुख़न आहिस्ता आहिस्ता
दाऊद सय्यद
ग़ज़ल
ब-रंग-ए-बू-ए-गुल उस बाग़ के हम आश्ना होते
कि हमराह-ए-सबा टुक सैर करते फिर हवा होते
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
लहू ब-रंग-ए-दिगर हुस्न-ए-लाला-ज़ार में है
ये दुख ख़िज़ाँ में कहाँ था जो अब बहार में है