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ग़ज़ल
अपने हाथ में इल्म की शम्अ' 'इरम' ने थामे रक्खी है
मैं तो एक उजाला ले कर दीदा-वर तक आई हूँ
इरुम ज़ेहरा
शेर
हर्फ़-ए-इंकार है क्यूँ नार-ए-जहन्नम का हलीफ़
सिर्फ़ इक़रार पे क्यूँ बाब-ए-इरम खुलता है
वहीद अख़्तर
ग़ज़ल
उसी को ज़िंदगी का लुत्फ़ है इस दहर-ए-फ़ानी में
कि जो नज़दीक अच्छों के भला और बा-ख़ुदा ठहरे
शिव नारायण आराम
ग़ज़ल
हर्फ़-ए-इंकार है क्यूँ नार-ए-जहन्नम का हलीफ़
सिर्फ़ इक़रार पे क्यूँ बाब-ए-इरम खुलता है
वहीद अख़्तर
ग़ज़ल
तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद
हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
क़ब्र में सोएँगे आराम से अब ब'अद-ए-फ़ना
आएगा ख़्वाब-ए-अदम दीदा-ए-बेदार के पास
