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ग़ज़ल
ये ज़रा सा कुछ और एक-दम बे-हिसाब सा कुछ
सर-ए-शाम सीने में हाँफता है सराब सा कुछ
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
फ़सील-ए-शब से अजब झाँकते हुए चेहरे
किरन किरन के हैं प्यासे हवा हवा के हैं
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
न हो मुख़िल मिरे अंदर की एक दुनिया में
बड़ी ख़ुशी से बर-ओ-बहर पर हुकूमत कर
राजेन्द्र मनचंदा बानी
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baanii-e-shar
बानी-ए-शर بانیِٔ شَر
दे. ‘बानिए फ़साद’।
jaam-e-shahr-baarii
जाम-ए-श्हर-बारी جامِ شَہْر باری
जाम-ए-श्हर-बारी बहुत बड़ा पुराना शराब पीने का पात्र अर्थात् प्याले को कहते हैं
daaG-e-chaar-band
दाग़-ए-चार-बंद داغِ چار بَنْد
(سالوتری) نِشان جو گھوڑے اور دِیگر مویشیوں کے پُٹّھوں اور شانوں پر ٹان٘گوں کی بِیماری (درد یا اکڑ) دُور کرنے کے لیے لویا گرم کر کے دیے جاتے ہیں .
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ग़ज़ल
मैं इक असरार-ए-मातम लाख ख़ुद में गुम हुआ जाऊँ
मगर सीना किसी शय की दुहाई साफ़ देता है
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
अजीब भीड़ यहाँ जम्अ है यहाँ से निकल
कहीं भी चल मगर इस शहर-ए-बे-अमाँ से निकल
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
'बानी' 'अजब तरह से खुली ख़ुश-मुक़द्दरी
बर्ग-ए-शफ़क़ भी बर्ग-ए-हिना भी मिरे लिए
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
उस ने अजब कुछ प्यार से अब के लिक्खा 'बानी'
बहुत दिनों फिर घूम लिया वापस घर आ
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
'बानी' नज़र का ज़ाविया बदला है इस तरह
अब हर फ़ज़ा से चीज़-ए-दिगर चुन रहा हूँ मैं
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
निकल गया है ख़लाओं की सम्त ऐ 'बानी'
नवाह-ए-जाँ से गुज़रता हुआ न जाने क्या
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
कोई भूली हुई शय ताक़-ए-हर-मंज़र पे रक्खी थी
सितारे छत पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
मैं क्यूँ बुराई सुनूँ दोस्तों की ऐ 'बानी'
अलग नहीं उन्हीं खोटे खरे दिलों से मैं