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ग़ज़ल
और कोई बात सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न कब निकली
बस तिरी बात ही निकली है यहाँ जब निकली
मेहदी बाक़र ख़ान मेराज
नज़्म
'मीर'
शाहिद-ए-बज़्म-ए-सुख़न नाज़ूरा-ए-मअ'नी-तराज़
ऐ ख़ुदा-ए-रेख़्ता पैग़मबर-ए-सोज़-अो-गुदाज़
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
शेर
लखनऊ में फिर हुई आरास्ता बज़्म-ए-सुख़न
बाद मुद्दत फिर हुआ ज़ौक़-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे
चकबस्त बृज नारायण
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ग़ज़ल
क्या गुज़रती है ख़बर है तुझे ऐ रूह-ए-'फ़िराक़'
दिल-ए-'जौहर' पे सर-ए-बज़्म-ए-सुख़न तेरे बाद
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
नज़्म
ग़लत-फ़हमी
मैं ने इक बज़्म-ए-सुख़न में कल ग़ज़ल अपनी पढ़ी
जिस को सुन कर अहल-ए-महफ़िल झूम उठ्ठे वज्द से
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
एक शहर-आशोब का आग़ाज़
अब बज़्म-ए-सुख़न सोहबत-ए-लब-सोख़्तगाँ है
अब हल्क़ा-ए-मय ताइफ़ा-ए-बे-तलबाँ है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जज़्ब-ए-ग़ैरत
फ़रोग़-ए-बज़्म-ए-सुख़न तेरी सरपरस्ती से
अदब शनास किया है तिरी अक़ीदत ने