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ग़ज़ल
ये बार-ए-मासियत मंज़िल कड़ी और शाम-ए-तन्हाई
चले हैं क्या समझ कर हम भी रुस्वा-ए-जहाँ हो कर
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
बार-हा जी में ये आई उम्र-ए-रफ़्ता से कहूँ
शाम होने को है ऐ भूले मुसाफ़िर घर तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
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baar-e-maa'siyat
बार-ए-मा'सियत بارِ مَعْصِیَت
पापों का बोझ
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ग़ज़ल
ज़िंदगी के नर्म काँधों पर लिए फिरते हैं हम
ग़म का जो बार-ए-गिराँ इनआम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
शिकवा-ए-वादा-ख़िलाफ़ी का मिला अच्छा जवाब
पेशगी रक्खी थी इक उम्मीद बर आई हुई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
जब सर्फ़-ए-गुफ़्तुगू हूँ तो देखे उन्हें कोई
मंज़ूर हो जो अब्र-ए-गुहर-बार देखना
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ओ-अदा मेहर-ओ-वफ़ा जौर-ओ-जफ़ा
सब के सब ख़ाना-बर-अंदाज़ नज़र आते हैं
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
करता हूँ जो बार बार बोसा-ए-रुख़ का सवाल
हुस्न के सदक़े से है मुझ को गदाई का इश्क़