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नज़्म
पहला जश्न-ए-आज़ादी
ऐ हिन्द के बाशिंदो आओ उजड़ा गुलज़ार सजा डालें
अब दौर-ए-ग़ुलामी ख़त्म हुआ इक ताज़ा जहाँ की बिना डालें
कँवल डिबाइवी
कुल्लियात
कुछ ‘इज़्ज़त-ए-कुफ़्र आख़िर ऐ दैर के बाशिंदो
मुझ सहल से को क्यों तुम ज़ुन्नार बँधाते हो
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
ख़ुश-बाशी-ओ-तंज़िया-ओ-तक़द्दुस थे मुझे 'मीर'
अस्बाब पड़े यूँ कि कई रोज़ से याँ हूँ
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
किस का काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम
कूचे के उस के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुए
वीराना क्यूँ हैं बस्तियाँ बाशिंदे क्या हुए
शीन काफ़ निज़ाम
ग़ज़ल
बाशिंदे हक़ीक़त में हैं हम मुल्क-ए-बक़ा के
कुछ रोज़ से मेहमान हैं इस दार-ए-फ़ना के