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ग़ज़ल
जंग में परवर-दिगार-ए-शब का क्या क़िस्सा हुआ
लश्कर-ए-शब सुब्ह की सरहद पे क्यूँ पसपा हुआ
जमुना प्रसाद राही
ग़ज़ल
इधर भी सूरत-ए-ज़ाहिद कोई निगाह-ए-करम
कि तेरे बंदों में परवर-दिगार हम भी हैं
नवाब उमराव बहादूर दिलेर
नज़्म
कौन ले गया
ऐ शाह बंदा-पर्वर-ए-सुल्तान-ए-नर्म-दिल
दिल से तिरे ख़याल-ए-गदा कौन ले गया
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तराना-ए-वतन
रखते हैं जिस की उल्फ़त गाते हैं जिस का नग़्मा
आक़ा-ए-बंदा-पर्वर शाह-ए-दकन हमारा